Sunday, 25 December 2011

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने दो बड़ी बेजोड़ बातें कही हैं। ये बातें कोई अन्य कांग्रेसी भूलकर भी नहीं कह सकता। जो बातें माननीय राहुलजी ने कही हैं, अगर वे ही कोई साधारण कांग्रेसी बोल देता तो उसे पार्टी कान पकड़कर बाहर निकाल देती।
राहुल ने युवक कांग्रेस के हजारों नौजवानों को संबोधित करते हुए कहा कि आप में से कोई भी यहां ‘पैराशूट’ से नहीं उतरा है। याने आप में से कोई भी ऊपर से नहीं थोपा गया है। सब लाखों साधारण सदस्यों के बीच से चुनकर आए हैं। कुछ हद तक ये बात ठीक भी है, क्योंकि कांग्रेस के इतिहास में पहली बार युवक कांग्रेस के सदस्यों ने अपने प्रतिनिधियों को चुना है लेकिन ये चुनाव कैसे हुए होंगे, इसकी तुलना कांग्रेस पार्टी के आंतरिक चुनावों से की जा सकती है। फर्जी सदस्यता और फर्जी मतदान की जैसी गहन विशेषज्ञता के लिए कांग्रेस पार्टी विख्यात है, वैसी दुनिया की कोई पार्टी नहीं है। क्या राहुल गांधी ने इस परंपरा को तोड़ा है या उसे उच्चतर आयाम प्रदान किए हैं? जो भी केंद्रीय समिति उन्होंने बनाई है, क्या उसे भी किसी ने चुना है? या वह राहुलजी के ‘पैराशूट’ में ही लदकर सबके कंधे पर सवार हो गई है? क्या युवक कांग्रेस के पदाधिकारी भी साधारण सदस्यों द्वारा चुने जाएंगे? या ऊपर से थोप दिए जाएंगे?
स्वयं राहुल गांधी का क्या हाल है? उन्हें किसने चुना है? क्या वे अपनी योग्यता से कांग्रेस महासचिव बने हैं? उनकी जितनी योग्यता है, वैसे तो लाखों लोग कांग्रेस में हैं। क्या वे कभी कांग्रेस के सचिव बनने का सपना भी देख सकते हैं? इसमें शक नहीं कि राहुल गांधी चाहे ‘पैराशूट’ से उतरे हों लेकिन वे जमीन पर चलना सीखने की जबर्दस्त कोशिश कर रहे हैं। इसे मायावती चाहे नौटंकी कहे लेकिन यह कोशिश सराहनीय है। क्या ही अच्छा होता कि वे ‘पैराशूट’ की बात अपनी जबान पर ही नहीं लाते। बात तो बहुत अच्छी है लेकिन उनके मुंह से शोभा नहीं देती। अब क्या करें, इन मुए बुड्ढे कांग्रेसी नेताओं का, राहुलजी को ऐन भाषण के वक्त पता नहीं क्या-क्या पट्टी पढ़ा देते हैं। हर बात पलटकर उन पर ही गिर पड़ती है। ‘बूमेरेंग’ हो जाती है।
दूसरी बात उन्होंने बहुत ही खरी-खरी कह दी है। उनका कहना है कि सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार राजनीति में है। उन्होंने यह नहीं बताया कि सबसे ज्यादा भ्रष्ट कौनसी पार्टी है और कौनसे नेता हैं? सबसे भ्रष्ट सरकार कौन-सी है? राजनीति अगर इतनी ही भ्रष्ट है तो उन्होंने इसी पर इतनी कृपा क्यों की है? उन्होंने इसे ही अपना धंधा क्यों बनाया ? क्या वे अपने आपको किसी अन्य धंधे के लायक नहीं पाते? उनके पिता पायलट ही बने रहते तो उनकी जान भी बचती और इज्जत भी बचती। उनका पद भी नहीं जाता। उन्हें अपने पिता से ही कुछ सबक सीखना चाहिए था। उन्होंने इतना तो जरूर सीखा कि वे सीधे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज नहीं हुए लेकिन पिछले 8-10 साल में क्या उन्होंने भ्रष्टाचार मिटाने या घटाने की एक भी पहल की? इस देश में अपूर्व भ्रष्टाचार के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है? क्या बड़ी कुर्सियों में धंसी हुई कठपुतलियॉं? नहीं ! उसकी सारी जिम्मेदारी उन लोगों पर है, जो इन कठपुतलियों को चला रहे हैं। कठपुतलियों का सरदार कठपुतलियों को भ्रष्ट कहे और इस बारे में करे कुछ नहीं तो उसे लोग क्या कहेंगे?

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